पेशे लफ़्ज़

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी

किसे तवक़्क़ो थी कि हमारी जदीद तहज़ीब में दास्तान का अहया हो सकता है ? बल्कि तवक़्क़ो से पहले की मंज़िल पर निगाह डाले तो कह सकते हैं कि किसे खबर थी कि दास्तान भी कोई फ़न है ? उर्दू, फ़ारसी पढ़ने वाले तालिब-इल्मों को शायद कुछ मालूम रहा हो, लेकिन वो भी उसी हद तक, जिस हद तक की उनके उस्तादों ने बताया था।और जो बताया था उसका लुब्बोलुबाब यह था कि दास्तान दरअसल नावेल की गैर- इरतक़ायाफ्त शक्ल है । बयानिये के फ़न, या बयानिये के ज़ौक ने इंसान को नयी- नयी तर्ज़ के बयानिये इजाद करने की तरफ़ माइल किया और दास्तान उसी तवील, ज़रा गुमनाम किस्म के इरतेक़ाई सफ़र की एक मंज़िल थी जो आयी और बहुत जल्द गुज़र गई, और नावेल ही बयानिये की सबसे तरक़्क़ीयाफ़्ता शक्ल है । लिहाज़ा दास्तान के बारे में जो हुक्म लगेगा वह उसी ऐतबार से और उसी तनाज़ुर में लगेगा कि वह बयानिया के इरतेक़ायी सफ़र में एक गुमगश्ता मंज़िल है, और उसकी अच्छाई- बुराई के बारे में जो फैसला होगा वो उन्हीं उसूलों की रौशनी में होगा जिन पर नावेल की शेरियात का दारोमदार है ।

इस बात से क़त-ए-नज़र कि ऊपर बयान की हुई सब बातें ग़लत हैं, इसमें बहरहाल कोई शक किसी को न था कि दास्तान और दास्तानगोई आज भी हमारे लिए कुछ दिलकशी या मानवीयत रख सकती हैं । लेकिन महमूद फ़ारूक़ी, अनुशा रिज़वी और उनके मुट्ठीभर साथियों ने दुनिया को दिखा दिया कि दास्तान अब भी ज़िंदा है, या ज़िंदा की जा सकती है । लेकिन उसके लिए दो चीज़ों की जरूरत थी ; एक तो कोई ऐसा शख़्स जो दास्तान को बख़ूबी जानता हो और उससे मोहब्बत करता हो । ऐसा शख़्स आज बिलकुल मादुम नहीं तो बहुत ही कमयाब ज़रूर है । दूसरी चीज़ जो अhयाय-ए-दास्तान के लिए लाज़िम थी वह था ऐसा शख्स जो उर्दू खूब जानता हो, फ़ारसी बक़दरे ज़रूरत जानता हो, और उसे अदाकारी में भी खूब दर्क हो, यानी उसे बयानिये और मकालमा को ड्रामाई तौर पर अदा करने पर क़ुदरत हो ।

उसे उर्दू अदब की, दास्तान की, और ख़ास करके हमारी खुशनसीबी तसव्वुर करना चाहिए कि दास्तानगोई के दुबारा जन्म की दास्तान के लिए मोतज़किरा बाला किरदार एक वक्त में और एक जगह जमा हो गए । शेक्सपिअर के ड्रामे ‘जूलियस सीज़र’ में एंटनी के जुमले की तरह का मामला रौ-नुमा हो गया कि ‘अब उसे अपना काम करने दें । फितना, अब तो बेदार है, जो राह चाहे इख्तेयार कर ।’

दास्तानगोई को मैंने फितना कहा तो उस माने में कि दास्तान के खिलाफ़ जो कुछ कहा और लिखा गया था, उसमें इस बात पर ख़ास ताकीद थी कि “दास्तान ग़ैर अक़्ली , ‘ख्याली और वाक़ेयात से खाली’ बातों का मजमूआँ है, उसे हक़ीक़ी ज़िंदगी’ से कोई सरोकार नहीं । इसमें नावेल की तरह की प्लाटसाजी है न किरदार निगारी वगैरह” । तो ऐसों की नज़र में दास्तान और दास्तानगोई को दुबारा फ़रोग देना ‘अदब के लिए एक फितना’ करार दिया जाता तो क्या अजब था । लेकिन ऐसा हुआ नहीं । और उसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि दास्तान का बयानिया इस कदर हाकिमाना, इस कदर मुस्तहकम और हमारी कई जबिल्लतों को बैकवक़्त बेदार कर देने वाला ऐसा फ़न पारा है जो ज़माने के फैशन और वक़ती मस्लेहतों के दबाव को काटता हुआ अपनी जगह बना लेता है । दूसरी वजह ग़ालिबन ये हो सकती है कि तफरीह के मुख़्तलिफ़ ज़राए कसीर तादाद में रायज हैं । दास्तानगोई को भी उन्हीं में से एक ज़रिया समझा गया और बयानियों के फ़न की मुत’अद्दद बारीकियों की वजह से उसे ख़ास तवज्जो और तहसीन से देखा और सुना गया ।

अब महमूद फ़ारूक़ी अपनी कही हुई दस्तानों पर मुश्तमिल एक और किताब मुहम्मद काज़िम की मदद से बाज़ार में ला रहें हैं तो दास्तानगोई का एक जदीद रूप भी सामने आ चुका है । बल्कि हम कहें कि दो जदीद रूप हैं, तो गलत न होगा । असल रूप तो वही पुरानी ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ है की उसकी दस्तानों में से इंतेख़ाब करके और ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ कि बाज़ इबारतों को नए सिरे से तरतीब देकर ऐसा दास्तानी बयानिया पेश किया जाए जो ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ ही कहा जाएगा । पहला जदीद रूप वह है जिसमें मआसिर ज़िंदगी या फौरी गुज़श्ता तारीख को दास्तानी रंग देकर और कभी- कभी ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ के बाज़ मकबूल किरदारों को भी (ख्वाह नाम की हद तक सही) शामिल करके ऐसा बयानिया तरतीब दिया जाता है जिसमें ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ का कुछ ज़ायका महसूस होता है, लेकिन जो कुछ बयान होता है उसका रेवायती दास्तानें अमीर हमज़ा (‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ उसका मक़बूलतरीन हिस्सा है) के वाक़ेयात और सूरत-ए-हालात का कोई ताल्लुक नहीं होता । दूसरा जदीद रूप वह है जिसका अब तक का सबसे मशहूर और मक़बूल नमूना ‘दास्तान – ए- कर्ण अज़ महाभारत’ है । यहाँ तर्ज़ सब दास्तानगोई के हैं लेकिन बुनियाद दास्तान-ए-अमीर हमज़ा नहीं, बल्कि महाभारत है । बयानिये में उर्दू के साथ दूसरी ज़बानें हस्ब-ए-ज़रूरत मिला कर रिवायती दास्तान के तर्ज़ को ज़रा और ‘रिवायती’ बनाया गया है ।

ये दोनों नए तर्ज़ अपनी जगह पर बहुत दिलकश और क़ुव्वतमंद हैं । लेकिन उनका वजूद और उनकी मक़बूलियत दास्तानगोई और खुद दास्तान की आइंदा ज़िंदगी के बारे में कुछ सवाल भी पैदा करते हैं । महमूद फ़ारूक़ी ने अव्वल रोज़ ही से दास्तानगोई में बाज़ जिद्दतें दाखिल कर दी थी, मसलन दो या कभी- कभी दो से भी ज़्यादा दास्तानगोयों का एक ही पेशकश में शरीक होना, साक़ीनामा और चेहरा के आशा’र भी मुश्तरक़ा क़िरत ज़रिये अदा करना, बहुत थोड़ा सही, लेकिन स्टेज को स्टेज का रंग देने का कुछ इंतेजाम और दास्तानगो (दास्तानगोयियों) का थोड़ा बहुत मेकअप । ये सब तरकीबें सामयीन को पसंद आई और बरकरार रखी गयीं ।

तो अब सवाल यह है कि क्या दास्तानगोई में कुछ मज़ीद नयी चीज़े दाखिल करना जरुरी हैं, या दास्तान के लिए मुज़िर ? इससे ज़्यादा अहम सवाल यह है कि दास्तान अमीर हमज़ा, जो तमाम दास्तानगोयों का मलजा और मावा रही है, उसे नज़रअंदाज़ करके किसी और तरह की दास्ताने पेश करना कहाँ तक दुरुस्त है ? क्या इस तरह दास्तानगोई का असल किरदार तब्दील न हो जाएगा ? दास्तान की शेरियात इस बात की गुंजाईश तो रखती है कि इसमें मआसिर दुनिया कहीं न कहीं से दर आ सकती है, और दास्तानगोयों ने उससे कुछ काम भी लिया है, मसलन तंज़िया अंदाज़ में अंग्रेज़ी राज का ज़िक्र जैसे ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ में एक शहर है, जिसका नाम ‘शहर ए नापुरसाँ ’ है । इस शहर में कागज़ का सिक्का चलता है और अमीर हमज़ा का नवासा वहाँ से गुज़रता है तो खूब हँसता हैं कि भला कागज़ का सिक्का कहीं होता है! लेकिन अगर पूरी दास्तान मासिर दुनिया के बारे में हो, तो फिर दास्तानगो के बारे में ख्याल गुज़र सकता है कि वह दास्तान अमीर हमज़ा को क़ायम बिलज़ात बयानिया नहीं समझता, बल्कि उसकी जगह मआसिर हालात का बयान डालकर वह खुद को अफ़साना निगारों के आम धारे में शरीक करना चाहता है ।

महमूद फ़ारूक़ी के बारे में यह तो नहीं कह सकते कि वह दास्तान-ए- अमीर हमज़ा से खुद को दूर रखने का ख्याल रखते हैं । उनकी जदीद दास्तानों को दास्तानगोई के फ़न का एक नया अंदाज़ ज़रूर कहा जाना चाहिए । महमूद फ़ारूक़ी ने सही कहा है कि दास्तानगोई दरअसल ‘दास्तान गढ़ने’ का फ़न है । ज़ेरे नज़र मज्मुए में भी अमीर हमज़ा पर मबनी कई चीजें हैं । मैं समझता हूँ कि रफ़्ता रफ़्ता उनकी दास्तानगोई में और भी रंग पैदा होंगे और सबका रिश्ता दास्तान-ए-अमीर हमज़ा से मज़बूत, बल्कि मज़बूत-तर होगा । ‘दास्तान ए कर्ण’ की क़ामयाबी और मक़बूलियत इस बात की तरफ़ भी इशारा करती है कि रिवायती बयानियों में ऐसी क़ूवतें और हक़दार हैं जो कहीं और नहीं मिलतीं ।

शम्शुर्रहमान फ़ारूक़ी
नयी दिल्ली, मार्च, 2018